(Congress Rule in Provinces) - UPSC Modern History
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(Congress Rule in Provinces) - UPSC Modern History
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प्रांतों में कांग्रेस शासन: 1934-1939
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर भविष्य की रणनीति, 1935 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधान, 1937 के प्रांतीय चुनाव, और कांग्रेस के शासन के प्रभावों पर गहन बहस और बदलाव हुए। इस कालखंड में कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद, ब्रिटिश औपनिवेशिक रणनीति, और भारतीय राजनीति में निर्णायक मोड़ आए।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद कांग्रेस में मतभेद
सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) के 1934 में समाप्त होने के बाद कांग्रेस के भीतर आगे की रणनीति को लेकर तीन प्रमुख धाराएं उभरीं। इन मतभेदों ने कांग्रेस…
प्रांतों में कांग्रेस शासन: 1934-1939
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद कांग्रेस के भीतर भविष्य की रणनीति, 1935 के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधान, 1937 के प्रांतीय चुनाव, और कांग्रेस के शासन के प्रभावों पर गहन बहस और बदलाव हुए। इस कालखंड में कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद, ब्रिटिश औपनिवेशिक रणनीति, और भारतीय राजनीति में निर्णायक मोड़ आए।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद कांग्रेस में मतभेद
सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) के 1934 में समाप्त होने के बाद कांग्रेस के भीतर आगे की रणनीति को लेकर तीन प्रमुख धाराएं उभरीं। इन मतभेदों ने कांग्रेस की दिशा और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति को प्रभावित किया।
- गांधीवादी खेमा: गांधी के रचनात्मक कार्यों (चरखा, ग्रामोद्योग, शिक्षा आदि) की निरंतरता पर जोर।
- चुनावी खेमा: संवैधानिक तरीकों से संघर्ष, विधानमंडलों में भागीदारी, चुनाव लड़ने की वकालत (प्रमुख नाम: आसफ अली, सत्यमूर्ति, एम.ए. अंसारी, भूला भाई देसाई, बी.सी. राय)।
- समाजवादी खेमा: नेहरू के नेतृत्व में वामपंथी दृष्टिकोण, वर्ग संघर्ष, समाजवाद की स्थापना, पूंजीवाद का विरोध।
भविष्य की रणनीति पर बहस
आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस के सामने दो मुख्य प्रश्न थे—आगे कौन-सा आंदोलन चलाया जाए और 1937 के चुनावों में क्या भूमिका हो। इन दोनों मुद्दों पर कांग्रेस के भीतर गहरे मतभेद रहे।
- रचनात्मक कार्य: गांधीवादी विचारधारा के अनुसार, आंदोलन के विराम के दौरान समाज में रचनात्मक कार्यों द्वारा चेतना बनाए रखना।
- चुनावों में भागीदारी: राजनीतिक निराशा से उबरने के लिए विधानमंडलों में प्रवेश, जनता में विश्वास बनाए रखना, कांग्रेस की जनाधार को मजबूत करना।
- समाजवादी दृष्टिकोण: नेहरू का वर्ग संघर्ष पर जोर, मजदूर-किसान संगठन, पूंजीपतियों व जमीदारों का विरोध, समाजवाद की स्थापना।
संघर्ष की रणनीति: गांधी बनाम नेहरू
गांधी और नेहरू के संघर्ष के तरीके में मूल अंतर था। गांधी संघर्ष-विराम-संघर्ष (Struggle-Truce-Struggle) की नीति के समर्थक थे, जबकि नेहरू संघर्ष-विजय-संघर्ष (Struggle-Victory-Struggle) के पक्षधर थे।
- गांधी की नीति: आंदोलन थकने पर विराम, पुनः ऊर्जा के साथ आरंभ; विभाजन से बचाव, समग्रता पर जोर।
- नेहरू की नीति: निरंतर संघर्ष, वर्ग संघर्ष का समर्थन, मजदूर-किसान को संगठित करना, सुधारवादी नीति का विरोध।
1935 का भारत सरकार अधिनियम: पृष्ठभूमि और प्रावधान
1919 के अधिनियम के 10 वर्षों बाद समीक्षा के लिए साइमन कमीशन (1927) का गठन हुआ, जिसका विरोध हुआ। गोलमेज सम्मेलनों की असफलता के बाद 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ, जो औपनिवेशिक नियंत्रण बनाए रखने का प्रयास था।
- अखिल भारतीय संघ का प्रावधान: ब्रिटिश भारत के प्रांत + देसी रियासतें; व्यावहारिक रूप में लागू नहीं हुआ।
- द्वैध शासन का अंत: प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त, गवर्नर संवैधानिक प्रमुख, चुनी हुई सरकार के पास शक्तियां।
- केंद्र में द्वैध शासन: केंद्र में आरक्षित (विदेश, रक्षा, जनजातीय, धार्मिक) और हस्तांतरित विषयों का विभाजन; व्यावहारिक रूप में लागू नहीं।
- विधानमंडल: द्विसदनीय—राज्य परिषद (स्थायी, उच्च सदन), संघीय सभा (निम्न सदन); अप्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था।
- तीन सूचियां: केंद्रीय, प्रांतीय, समवर्ती सूची का प्रावधान।
- गवर्नर जनरल की शक्तियां: वित्त, रक्षा, अल्पसंख्यक, सरकारी सेवक, अंग्रेजी-बर्मी माल, भारतीय राजाओं के हित, निजी विवेकाधीन शक्तियां।
- संघीय न्यायालय, आरबीआई की स्थापना, नए प्रांत (उड़ीसा, सिंध), प्रांतीय स्वायत्तता।
1937 के प्रांतीय चुनाव: रणनीति और परिणाम
1935 के अधिनियम का विरोध सर्वसम्मति से हुआ, परंतु आंदोलन असंभव होने पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया गया। कांग्रेस ने सात प्रांतों में सरकार बनाई, जिससे उसकी जनाधार और राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ी।
- कांग्रेस की सरकारें: बंबई, मद्रास, मध्य भारत, उड़ीसा, बिहार, संयुक्त प्रांत, असम/पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत।
- मुस्लिम लीग का प्रदर्शन: 106 सीटें, अपेक्षा से बहुत कम; प्रांतों में सरकार नहीं बना पाई।
- अन्य दल: सिंध—यूनाइटेड पार्टी, पंजाब—यूनियनिस्ट पार्टी।
कांग्रेस शासन के दौरान सुधार और चुनौतियां
कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आज़ादी, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, भूमि वापसी, पुलिस अधिकारों में कटौती, मजदूरों के हित, समाज कल्याण, शिक्षा, खादी, स्वदेशी उद्योग, राष्ट्रीय योजना समिति (1938, अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस) जैसे कई सुधार किए।
- नागरिक स्वतंत्रता: आपातकालीन अधिकार रद्द, प्रतिबंधित संगठन/पत्रिकाओं पर से प्रतिबंध हटाया।
- मजदूर नीति: औद्योगिक शांति, हड़तालों में मध्यस्थता, मजदूर हितों की रक्षा।
- कृषि सुधार: जमीदारी प्रथा समाप्त करने का प्रयास सीमित; वित्तीय संसाधनों की कमी, उच्च वर्ग का दबाव।
- समाज कल्याण: शराब निषेध, शिक्षा, बंदी सुधार, खादी का प्रचार।
- प्रशासनिक बाधाएं: विधान परिषद में जमींदार-पूंजीपति वर्चस्व, सीमित अधिकार, वित्तीय संसाधनों का अभाव।
कांग्रेस के भीतर अंतर्विरोध और त्यागपत्र
1939 के अंत तक कांग्रेस के भीतर सत्ता के लिए अवसरवादिता, आंतरिक कलह, और जोड़-तोड़ की प्रवृत्तियां दिखने लगीं। द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ के साथ ही कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने अक्टूबर 1939 में त्यागपत्र दे दिया।
- मूल्यांकन: कांग्रेस ने 28 महीने शासन किया, भारतीयों की प्रशासनिक क्षमता सिद्ध हुई, सांप्रदायिकता पर अंकुश, नौकरशाही का मनोबल गिरा।
- मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया: कांग्रेस के त्यागपत्र को 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाया गया, लीग ने प्रांतीय स्वायत्तता से पाकिस्तान की मांग की ओर रुख किया।
1937 के चुनावों के परिणाम और दूरगामी प्रभाव
1937 के चुनावों में लगभग 1500 सीटों में से कांग्रेस ने 711 सीटें जीतीं और सात राज्यों में स्पष्ट सरकार बनाई। मुस्लिम लीग को केवल 106 सीटें मिलीं, जिससे उसका जनाधार कमजोर सिद्ध हुआ।
- कांग्रेस की जीत: जनता के बीच गहरी पैठ, स्वशासन की क्षमता का प्रदर्शन।
- मुस्लिम लीग की हार: प्रांतों में सरकार न बना पाना, पाकिस्तान की मांग की ओर झुकाव।
- राजनीतिक परिदृश्य: कांग्रेस की लोकप्रियता, ब्रिटिश औपनिवेशिक रणनीति की असफलता, भारतीय राजनीति में निर्णायक बदलाव।
प्रमुख कथन और समकालीन दृष्टिकोण
- नेहरू: "हमें एक ऐसी कार दी गई है जिसमें अनेक ब्रेक हैं किंतु इंजन का अभाव है।"
- लॉर्ड लिलिथगो: भारत पर अंग्रेजी प्रभुत्व बनाए रखने का सर्वोत्तम तरीका।
- बी.आर. टॉमलिंसन: संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया भारतीयों को उपनिवेश शासन की ओर आकृष्ट करने का प्रयास।
निष्कर्ष: कांग्रेस शासन का ऐतिहासिक महत्व
1934-1939 के कालखंड में कांग्रेस के भीतर वैचारिक बहस, 1935 के अधिनियम के तहत चुनाव, और प्रांतीय सरकारों के गठन ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी। कांग्रेस ने प्रशासनिक क्षमता, सामाजिक सुधार, और जनाधार को सिद्ध किया, जबकि मुस्लिम लीग की विफलता ने उसके दृष्टिकोण को बदल दिया। यह कालखंड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णायक मोड़ों में से एक रहा।
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Question 1 of 30
मॉर्ले-मिंटो सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन से कथन सही हैं?
पृथक निर्वाचन मंडल की अवधारणा पेश की गई। शाही विधान परिषद और प्रांतीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि। ब्रिटिश भारत के प्रांतों के लिए द्वैध शासन व्यवस्था की शुरूआत। सुधारों का उद्देश्य राष्ट्रवाद की बढ़ती लहर के खिलाफ नरमपंथियों और मुसलमानों को एकजुट करना था।नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर का चयन कीजिये:
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केवल 1, 2 और 4
निम्नलिखित में से किस अधिनियम ने ब्रिटिश शासन के दौरान प्रांतीय स्वायत्तता निर्धारित की?
Solution
भारत सरकार अधिनियम, 1935
1924 की मुद्दिमैन समिति का संबंध था:
Solution
भारत सरकार अधिनियम, 1919 की समीक्षा के लिए सुधार जांच समिति।
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