Complete Indian Economy Basic - UPSC Indian Economy
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Complete Indian Economy Basic - UPSC Indian Economy
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भारतीय अर्थव्यवस्था: राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास के मूलभूत सिद्धांत
अर्थव्यवस्था के क्षेत्र
अर्थव्यवस्था वह भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ मानव की आर्थिक क्रियाएँ घटित होती हैं, जैसे उत्पादन, उपभोग, वितरण आदि। भारतीय अर्थव्यवस्था को तीन मुख्य क्षेत्रों में बाँटा जाता है: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। तृतीयक क्षेत्र के भी दो उपभाग होते हैं: चतुर्थ और पंचम।
- प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector):
- कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, खनन, उत्खनन
- उत्पाद प्रकृति से प्राप्त होते हैं
- द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector):
- उद्योग, विनिर्माण, निर्माण, विद्युत, जलापूर्ति
- प्राथमिक क्षेत्र के कच्चे माल से नया उत्पाद बनता है…
भारतीय अर्थव्यवस्था: राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास के मूलभूत सिद्धांत
अर्थव्यवस्था के क्षेत्र
अर्थव्यवस्था वह भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ मानव की आर्थिक क्रियाएँ घटित होती हैं, जैसे उत्पादन, उपभोग, वितरण आदि। भारतीय अर्थव्यवस्था को तीन मुख्य क्षेत्रों में बाँटा जाता है: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। तृतीयक क्षेत्र के भी दो उपभाग होते हैं: चतुर्थ और पंचम।
- प्राथमिक क्षेत्र (Primary Sector):
- कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, खनन, उत्खनन
- उत्पाद प्रकृति से प्राप्त होते हैं
- द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector):
- उद्योग, विनिर्माण, निर्माण, विद्युत, जलापूर्ति
- प्राथमिक क्षेत्र के कच्चे माल से नया उत्पाद बनता है
- तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector):
- सेवाएँ: भंडारण, परिवहन, विपणन, बैंकिंग, बीमा, लोक प्रशासन
- प्राथमिक व द्वितीयक दोनों को सेवाएँ देता है
- चतुर्थ क्षेत्र: अत्यधिक कुशल सेवाएँ (जैसे अनुसंधान, बैंकिंग)
- पंचम क्षेत्र: अत्यधिक कुशल + निर्णय क्षमता (जैसे लोक प्रशासन, IAS)
अर्थव्यवस्था के एजेंट
अर्थव्यवस्था में आर्थिक क्रियाएँ तीन प्रमुख एजेंट्स द्वारा संचालित होती हैं: परिवार, कंपनी और सरकार। ये सभी उत्पादन, उपभोग, वितरण आदि में भाग लेते हैं।
- परिवार (Household): उपभोग, श्रम, बचत
- कंपनी (Company): उत्पादन, निवेश, लाभ
- सरकार (Government): नीति निर्माण, सार्वजनिक सेवाएँ, कर संग्रह
विदेशी कंपनियाँ जो देश में कार्यरत हैं, वे भी अर्थव्यवस्था के एजेंट मानी जाती हैं।
उत्पादन के कारक
उत्पादन के लिए चार मुख्य कारक आवश्यक हैं: भूमि, पूंजी, श्रमिक और उद्यमी। प्रत्येक कारक का अपना विशिष्ट योगदान और प्रतिफल होता है।
- भूमि (Land): प्राकृतिक संसाधन, किराया
- पूंजी (Capital): मशीन, उपकरण, धन; दो प्रकार:
- स्थिर पूंजी (Fixed Capital): दीर्घकालिक संपत्ति (जैसे मशीन, वाहन)
- कार्यशील पूंजी (Working Capital): कच्चा माल, पेट्रोल, बीज, उर्वरक
- श्रमिक (Labour): मानव श्रम, वेतन
- उद्यमी (Entrepreneur): प्रबंधन, जोखिम, लाभ
पूंजी के प्रकार:
- भौतिक पूंजी (Physical Capital): मूर्त, छूने योग्य (मशीन, पैसा)
- मानव पूंजी (Human Capital): अमूर्त, कौशल, शिक्षा, स्वास्थ्य
कारक लागत और कारक आय
उत्पादन के कारकों को प्रतिफल के रूप में जो भुगतान किया जाता है, उसे कारक लागत कहते हैं। प्राप्तकर्ता के लिए यह कारक आय होती है। कुल कारक लागत और कुल कारक आय बराबर होती है।
- भूमि: किराया (Rent)
- पूंजी: ब्याज (Interest)
- श्रमिक: वेतन (Wages)
- उद्यमी: लाभ (Profit)
कुल कारक लागत = कुल किराया + कुल ब्याज + कुल वेतन + कुल लाभ
बाजार मूल्य, कारक लागत और सब्सिडी/कर
बाजार मूल्य वह मूल्य है जिसमें कारक लागत के साथ अप्रत्यक्ष कर (जैसे GST) जोड़ा जाता है और सब्सिडी घटाई जाती है।
- बाजार मूल्य = कारक लागत + अप्रत्यक्ष कर - सब्सिडी
- कारक लागत = बाजार मूल्य - अप्रत्यक्ष कर + सब्सिडी
राष्ट्रीय आय (National Income) = एनएपी (कारक लागत पर)
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP)
GDP देश की घरेलू सीमा के भीतर उत्पादित अंतिम वस्तु और सेवा का कुल बाजार मूल्य है। यह भौगोलिक अवधारणा है।
- देश में स्थित विदेशी कंपनियों का उत्पादन भी शामिल
- देश के बाहर उत्पादित वस्तुएँ शामिल नहीं
GNP देश के नागरिकों/कंपनियों द्वारा देश और विदेश में उत्पादित अंतिम वस्तु और सेवा का कुल बाजार मूल्य है। यह राष्ट्रीय अवधारणा है।
- देश के नागरिकों/कंपनियों का विदेश में उत्पादन शामिल
- देश में स्थित विदेशी कंपनियों का उत्पादन शामिल नहीं
GNP = GDP + (देश के नागरिकों की विदेश में आय - विदेशियों की देश में आय)
- इसे नेट फैक्टर इनकम फ्रॉम अब्रॉड (NFIA) भी कहते हैं
मूल्य ह्रास (Depreciation) और शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
मूल्य ह्रास (Depreciation) का अर्थ है संपत्ति की टूट-फूट या घिसावट। सकल से शुद्ध (नेट) निकालने के लिए मूल्य ह्रास घटाया जाता है।
- NNP (Net National Product) = GNP - मूल्य ह्रास
- NNP (कारक लागत पर) = राष्ट्रीय आय
प्रति व्यक्ति आय और कुल प्रजनन दर (TFR)
प्रति व्यक्ति आय कुल राष्ट्रीय आय को कुल जनसंख्या से विभाजित कर प्राप्त होती है। यह औसत वार्षिक आय है।
- प्रति व्यक्ति आय = कुल राष्ट्रीय आय / कुल जनसंख्या
कुल प्रजनन दर (TFR): एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। भारत में TFR घटकर 1.9 (2023) हो गया है, जो जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सहायक है।
जीडीपी की गणना पद्धति
गणना के लिए तीन विधियाँ हैं, जिनमें भारत में मुख्यतः दो का प्रयोग होता है: व्यय विधि और उत्पाद विधि।
- आय विधि (Income Method): कुल कारक आय (किराया, ब्याज, वेतन, लाभ) का योग
- व्यय विधि (Expenditure Method):
- = उपभोग व्यय (परिवार)
- = निवेश व्यय (कंपनी)
- = सरकारी व्यय
- = निर्यात
- = आयात
- उत्पाद विधि (Product Method): सकल मूल्यवर्धन (GVA) का योग
- मूल्यवर्धन = अंतिम वस्तु का मूल्य - मध्यवर्ती वस्तु का मूल्य
- GDP = GVA + अप्रत्यक्ष कर - सब्सिडी
वास्तविक और मौद्रिक जीडीपी
गणना दो मूल्यों में होती है: आधार वर्ष के मूल्य (वास्तविक) और चालू वर्ष के मूल्य (मौद्रिक/नॉमिनल) में।
- वास्तविक जीडीपी (Real GDP): आधार वर्ष के मूल्य में, मुद्रास्फीति समायोजित नहीं होती
- मौद्रिक जीडीपी (Nominal GDP): चालू वर्ष के मूल्य में, मुद्रास्फीति शामिल होती है
- आधार वर्ष: गणना का आधार, हाल में 2022-23 निर्धारित
जीडीपी वृद्धि दर, सुस्ती, मंदी और महामंदी
ग्रोथ रेट पिछले वर्ष की तुलना में वर्तमान वर्ष के जीडीपी में प्रतिशत वृद्धि है। यह सकारात्मक या नकारात्मक दोनों हो सकती है।
- तेजी: जीडीपी वृद्धि दर लगातार बढ़ रही है
- सुस्ती: वृद्धि दर बढ़ रही है, पर दर कम हो रही है
- मंदी: जीडीपी वृद्धि दर लगातार दो तिमाही नकारात्मक
- महामंदी: लगातार तीन तिमाही नकारात्मक वृद्धि दर + 10% से अधिक गिरावट
जीडीपी गणना पद्धति में हालिया परिवर्तन
2026 में जीडीपी गणना पद्धति में मुख्य परिवर्तन हुए हैं:
- आधार वर्ष: 2011-12 से बदलकर 2022-23
- डिफ्लेशन मेथड: सिंगल से डबल डिफ्लेशन (इनपुट व आउटपुट दोनों में मुद्रास्फीति का प्रभाव हटाना)
- अनौपचारिक क्षेत्र: अब सही गणना (All India Survey of Unincorporated Sector Enterprises)
- GVA और GDP में अंतर: अप्रत्यक्ष कर और सब्सिडी के कारण
आर्थिक समृद्धि, विकास, समावेशी और सतत विकास
आर्थिक समृद्धि मात्रात्मक होती है, इसकी गणना संभव है (जैसे जीडीपी वृद्धि दर, प्रति व्यक्ति आय)। विकास गुणात्मक होता है, जीवन स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता आदि को दर्शाता है।
- समृद्धि: मात्रात्मक, गणना संभव, सूचक: जीडीपी, प्रति व्यक्ति आय
- विकास: गुणात्मक, जीवन स्तर, मानव विकास सूचकांक
- समावेशी विकास: विकास का लाभ सभी वर्गों को मिले
- सतत/धारणीय विकास: संसाधनों का ऐसा प्रयोग कि भविष्य की पीढ़ी के लिए भी सुरक्षित रहें (जैसे ग्रीन जीडीपी, सर्कुलर इकॉनमी)
तालिका: मंदी और महामंदी की शर्तें
| स्थिति | शर्तें |
|---|---|
| मंदी | लगातार 2 तिमाही नकारात्मक जीडीपी वृद्धि दर |
| महामंदी | लगातार 3 तिमाही नकारात्मक + 10% से अधिक गिरावट |
- आर्थिक समृद्धि के बिना विकास संभव नहीं।
- समावेशी विकास में सबका साथ, सबका विकास।
- सतत विकास में पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक।
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Question 1 of 40
निम्नलिखित में से कौन, किसी देश के समग्र विकास का आकलन करते समय आर्थिक उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभाव और सामाजिक लागत को ध्यान में रखता है?
Solution
वास्तविक प्रगति सूचकांक
Solution
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की गणना में घरेलू सीमा पार गतिविधियों को ध्यान में नहीं रखा जाता है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) में मध्यवर्ती वस्तुएं और सेवाएं शामिल हैं।उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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