Complete Physical Geography Earth: Origin - UPSC Geography
Watch Video
Study smarter with Pi Lens
Get Notes, PYQs, Quiz and more for any Youtube video!

Complete Physical Geography Earth: Origin - UPSC Geography
274 views
OnlyIAS हिंदी माध्यम
Notes
Video Summary
पृथ्वी की उत्पत्ति, संरचना एवं भूवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
ब्रह्मांड और पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धांत
ब्रह्मांड और पृथ्वी की उत्पत्ति को समझने के लिए विभिन्न सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं, जिन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: प्रारंभिक (क्लासिकल) सिद्धांत और आधुनिक सिद्धांत। क्लासिकल सिद्धांतों में निहारिका परिकल्पना, चमबरलिन-मल्टन परिकल्पना आदि आती हैं, जबकि आधुनिक सिद्धांतों में बिग बैंग थ्योरी और स्थिर अवस्था सिद्धांत प्रमुख हैं।
- क्लासिकल सिद्धांत:
- निहारिका परिकल्पना (कांट, 1755): प्रारंभ में गैस और धूल के विशाल बादल (नेबुला) थे, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचित हुए। केंद्र में सूर्य और चारों ओर ग्रह बने।…
पृथ्वी की उत्पत्ति, संरचना एवं भूवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
ब्रह्मांड और पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धांत
ब्रह्मांड और पृथ्वी की उत्पत्ति को समझने के लिए विभिन्न सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं, जिन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: प्रारंभिक (क्लासिकल) सिद्धांत और आधुनिक सिद्धांत। क्लासिकल सिद्धांतों में निहारिका परिकल्पना, चमबरलिन-मल्टन परिकल्पना आदि आती हैं, जबकि आधुनिक सिद्धांतों में बिग बैंग थ्योरी और स्थिर अवस्था सिद्धांत प्रमुख हैं।
- क्लासिकल सिद्धांत:
- निहारिका परिकल्पना (कांट, 1755): प्रारंभ में गैस और धूल के विशाल बादल (नेबुला) थे, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण संकुचित हुए। केंद्र में सूर्य और चारों ओर ग्रह बने।
- लाप्लास का संशोधन (1796): कांट की परिकल्पना में संशोधन कर डिस्क के आकार की संरचना का उल्लेख।
- चमबरलिन-मल्टन परिकल्पना: सूर्य के पास से एक अन्य तारा गुजरने पर सूर्य से पदार्थ खिंचकर शगारनुमा आकृति में ग्रह बने।
- जींस-जेफरीज का समर्थन: चमबरलिन-मल्टन की परिकल्पना का समर्थन किया।
- आधुनिक सिद्धांत:
- बिग बैंग थ्योरी (जॉर्ज लेमेत्रे, 1927): ब्रह्मांड की उत्पत्ति 13.8 अरब वर्ष पूर्व एक अत्यधिक घनत्व और तापमान वाली सिंगुलरिटी से महाविस्फोट (बिग बैंग) के रूप में हुई। विस्फोट के बाद ब्रह्मांड लगातार फैल रहा है और घनत्व घटता जा रहा है।
- स्थिर अवस्था सिद्धांत (फ्रेड होयल, बोंडी, गोल्ड): ब्रह्मांड फैल रहा है लेकिन उसकी घनत्व स्थिर है। वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में इसे अस्वीकार किया गया।
- नेबुला (निहारिका): गैस और धूल के विशाल बादल, जिन्हें तारों के निर्माण की नर्सरी कहा जाता है।
तारों, ग्रहों और सौरमंडल का निर्माण
बिग बैंग के बाद पदार्थ और ऊर्जा असमान रूप से वितरित हुए, जिससे कहीं-कहीं घनत्व अधिक हो गया। अधिक घनत्व वाले क्षेत्रों में गुरुत्वाकर्षण के कारण पदार्थ संकेंद्रित हुआ और केंद्र में नाभिकीय संलयन से तारे बने। तारों के चारों ओर बचे पदार्थ से ग्रहणु बने, जो आपस में मिलकर ग्रह बने।
- तारों का निर्माण: गुरुत्वाकर्षण के कारण गैस और धूल संकेंद्रित होकर केंद्र में नाभिकीय संलयन शुरू करती है, जिससे तारा बनता है।
- ग्रहों का निर्माण: तारे के चारों ओर बचे पदार्थ से छोटे-छोटे ग्रहणु बनते हैं, जो आपस में मिलकर ग्रह बनते हैं।
- नेबुला: तारों के निर्माण की नर्सरी।
- ग्रहों के प्रकार: सूर्य के निकट के चार ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) आंतरिक/टेरेस्ट्रियल ग्रह; बाहरी चार (बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण) जोवियन/गैसीय ग्रह।
- क्षुद्र ग्रह पेटी: मंगल और बृहस्पति के बीच छोटे-छोटे पिंडों की पेटी।
- क्वीपर बेल्ट: वरुण के बाद बर्फीले पिंडों की पेटी।
तारे का जीवन चक्र और चंद्रशेखर सीमा
तारों का जीवन चक्र उनके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। उच्च द्रव्यमान वाले तारे सुपरनोवा के बाद न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल में बदलते हैं, जबकि कम द्रव्यमान वाले तारे वाइट ड्वार्फ और अंततः ब्लैक ड्वार्फ बनते हैं।
- चंद्रशेखर सीमा (1.44 सौर द्रव्यमान): यदि तारे का द्रव्यमान 1.44 सौर द्रव्यमान से कम है तो वह वाइट ड्वार्फ बनेगा; अधिक है तो ब्लैक होल।
- ब्लैक होल: अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र, जिससे प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता। इसकी सीमा को इवेंट होराइजन कहते हैं।
- सुपरनोवा: तारे के जीवन के अंतिम चरण में विस्फोट।
- न्यूट्रॉन स्टार: सुपरनोवा के बाद बचा अत्यधिक घनत्व वाला तारा।
आकाशगंगा, सौरमंडल और गोल्डीलॉक्स जोन
आकाशगंगा तारों का समूह है। हमारी आकाशगंगा का नाम मिल्की वे (दुग्ध मेखला) है, जिसमें 100 से 400 अरब तारे हैं। सूर्य मिल्की वे की ओरियन स्पर शाखा में स्थित है। गोल्डीलॉक्स जोन वह क्षेत्र है जहाँ जीवन के लिए उपयुक्त तापमान होता है।
- आकाशगंगा: ब्रह्मांड में लगभग 10 अरब आकाशगंगाएँ हैं।
- मिल्की वे: हमारी आकाशगंगा, जिसमें 100-400 अरब तारे हैं।
- गोल्डीलॉक्स जोन (वास योग्य क्षेत्र): वह क्षेत्र जहाँ तापमान न बहुत अधिक न बहुत कम हो, जिससे पानी तरल रूप में रह सके और जीवन संभव हो।
- सौरमंडल के ग्रह: बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण (सूर्य से दूरी के अनुसार)।
भूवैज्ञानिक समय सारणी (Geological Time Scale)
पृथ्वी के 460 करोड़ वर्षों के इतिहास को वैज्ञानिकों ने कालखंडों में विभाजित किया है, जिससे पृथ्वी के विकास और प्रमुख घटनाओं को समझा जा सके। यह विभाजन सुपर इयन, इयन, एरा, पीरियड और एपॉक में किया गया है।
- सुपर इयन: प्रीकैम्ब्रियन (हेडन, आर्कियन, प्रोटेरोजोइक)
- हेडन (4.6-4 अरब वर्ष पूर्व): पृथ्वी का निर्माण।
- आर्कियन (4-2.5 अरब वर्ष पूर्व): प्रारंभिक जीवन।
- प्रोटेरोजोइक (2.5 अरब-550 मिलियन वर्ष पूर्व): समुद्र और जीवन की उत्पत्ति।
- फेनेरोजोइक (550 मिलियन वर्ष पूर्व-वर्तमान): स्पष्ट जीवन के प्रमाण।
- एरा: पैलियोजोइक (550-250 मिलियन वर्ष), मेसोजोइक (250-66 मिलियन वर्ष), सेनोजोइक (66 मिलियन वर्ष-वर्तमान)
- पीरियड: पैलियोजोइक में कैंब्रियन, ओर्डोविसियन, सिल्यूरियन, डेवोनियन, कार्बोनिफेरस, पर्मियन; मेसोजोइक में ट्रायासिक, जुरासिक, क्रिटेशियस; सेनोजोइक में टर्शियरी, क्वार्टरनरी।
- महत्वपूर्ण घटनाएँ: डायनासोर का युग (जुरासिक), हिमालय का निर्माण (टर्शियरी), मानव का आगमन (होलोसिन)।
- मास एक्सटिंक्शन: पृथ्वी पर पाँच बार प्राकृतिक कारणों से बड़े पैमाने पर जीवन का विनाश हुआ; छठा (एंथ्रोपोसीन) मानवजनित है।
पृथ्वी की आंतरिक संरचना
पृथ्वी की आंतरिक संरचना को रासायनिक और भौतिक गुणों के आधार पर समझा जाता है। मुख्यतः क्रस्ट, मेंटल और कोर तीन प्रमुख परतें हैं। घनत्व के आधार पर भारी पदार्थ केंद्र में और हल्का पदार्थ सतह पर है।
- क्रस्ट (भूपर्पटी): सबसे ऊपरी परत, औसत मोटाई 35 किमी।
- महाद्वीपीय क्रस्ट: महाद्वीपों के नीचे।
- महासागरीय क्रस्ट: महासागरों के नीचे।
- मेंटल: क्रस्ट के नीचे, 2900 किमी गहराई तक।
- अपर मेंटल और लोअर मेंटल।
- कोर: मेंटल के नीचे, 6400 किमी तक।
- आउटर कोर (तरल), इनर कोर (ठोस)।
- लिथोस्फीयर: क्रस्ट + अपर मेंटल का ऊपरी 65 किमी हिस्सा।
- एस्थेनोस्फीयर: 100-400 किमी गहराई तक दुर्बलता मंडल।
- घनत्व, तापमान, दबाव: क्रस्ट से कोर की ओर बढ़ते हैं।
- क्रस्ट: 2.7 ग्राम/सेमी³, 0-400°C
- मेंटल: 400-3700°C
- कोर: 3700-6000°C, 13 ग्राम/सेमी³
पृथ्वी की आंतरिक संरचना के स्रोत
पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों से मिलती है। प्रत्यक्ष स्रोतों में खान-खनन और ड्रिलिंग, अप्रत्यक्ष में ज्वालामुखी उद्गार, भूकंपीय तरंगें, उल्कापात, चुंबकीय क्षेत्र और गुरुत्वाकर्षण बल शामिल हैं।
- प्रत्यक्ष स्रोत: सबसे गहरी खान (3.9 किमी, दक्षिण अफ्रीका), कोला प्रायद्वीप ड्रिलिंग (12 किमी, रूस)।
- अप्रत्यक्ष स्रोत: ज्वालामुखी उद्गार, भूकंप की तरंगें (P, S, L), उल्कापात, चुंबकीय क्षेत्र, पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण।
- भूकंपीय तरंगें: P वेव (सॉलिड, लिक्विड, गैस में चलती है), S वेव (केवल सॉलिड में), L वेव (धरातलीय)।
- डिस्कंटिन्यूटी लाइनें: कोनार्ड (महाद्वीपीय व महासागरीय क्रस्ट के बीच), मोहो (क्रस्ट-मेंटल), रेपिटी (अपर-लोअर मेंटल), गुटेनबर्ग (मेंटल-कोर), लेहमन (आउटर-इनर कोर)।
पृथ्वी की रासायनिक संरचना
पृथ्वी की रासायनिक संरचना को क्रस्ट, मेंटल और कोर के वॉल्यूम, मास और प्रमुख तत्वों के आधार पर समझा जाता है।
- क्रस्ट: वॉल्यूम 0.5-1%, मास ~1%, तत्व: ऑक्सीजन (46%), सिलिकॉन, एलुमिनियम, कैल्शियम।
- मेंटल: वॉल्यूम 83%, मास ~67%, तत्व: ऑक्सीजन, मैग्नीशियम, सिलिकॉन।
- कोर: वॉल्यूम 16%, मास ~32%, तत्व: निकिल (15-16%), फेरस (85%)।
- सियाल, सीमा, नीफे: एनसीईआरटी में प्रयुक्त पारंपरिक नाम।
उल्कापिंड, उल्का और उल्काब
मंगल और बृहस्पति के बीच क्षुद्र ग्रह पेटी से निकले पिंडों को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने और सतह पर गिरने के आधार पर तीन नाम दिए जाते हैं।
- मीटियोरॉइड (उल्काब): स्पेस में घूमता पिंड।
- मिट्योर (उल्का): वायुमंडल में प्रवेश कर जलता हुआ पिंड (टूटता तारा)।
- मिट्योराइट (उल्कापिंड): पृथ्वी की सतह पर गिरा पिंड।
पृथ्वी और चंद्रमा की उत्पत्ति एवं विकास की समयरेखा
पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर जीवन के विकास तक की प्रमुख घटनाओं की समयरेखा निम्न है:
- 13.8 अरब वर्ष पूर्व: बिग बैंग।
- 5-6 अरब वर्ष पूर्व: तारों का निर्माण।
- 4.6 अरब वर्ष पूर्व: पृथ्वी का निर्माण।
- 4.4 अरब वर्ष पूर्व: थिया नामक पिंड पृथ्वी से टकराया, पृथ्वी का हिस्सा टूटकर चंद्रमा बना (जॉइंट इंपैक्ट/बिग स्प्लैश)।
- 4 अरब वर्ष पूर्व: महासागरों का निर्माण।
- 3.8 अरब वर्ष पूर्व: जीवन की शुरुआत।
- 2.5-2.9 अरब वर्ष पूर्व: प्रकाश संश्लेषण की शुरुआत।
ग्रेविटेशनल लेंसिंग और आइंस्टाइन रिंग
स्पेस में प्रकाश की किरणें जब भारी वस्तु (जैसे गैलेक्सी) के पास से गुजरती हैं तो गुरुत्वाकर्षण के कारण मुड़ जाती हैं। इस घटना को ग्रेविटेशनल लेंसिंग कहते हैं। जब प्रकाश चारों ओर घूमता है तो आइंस्टाइन रिंग बनती है।
- ग्रेविटेशनल लेंसिंग: भारी वस्तु के कारण प्रकाश का मार्ग बदलना।
- आइंस्टाइन रिंग: प्रकाश का लेंस के रूप में घूमना।
परीक्षा के दृष्टिकोण से मुख्य बिंदु
- ब्रह्मांड की उत्पत्ति का सर्वाधिक वैज्ञानिक सिद्धांत: बिग बैंग थ्योरी (जॉर्ज लेमेत्रे, बेल्जियम)।
- पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी का सर्वोत्तम स्रोत: भूकंपीय तरंगें (P, S)।
- चंद्रशेखर सीमा: 1.44 सौर द्रव्यमान।
- पृथ्वी का औसत घनत्व: 5.5 ग्राम/सेमी³।
- पृथ्वी की सतह से कोर की ओर तापमान, घनत्व, दबाव तीनों बढ़ते हैं।
- गोल्डीलॉक्स जोन: जीवन के लिए उपयुक्त तापमान क्षेत्र।
- उल्काब (मीटियोरॉइड), उल्का (मिट्योर), उल्कापिंड (मिट्योराइट) में अंतर।
- भूवैज्ञानिक समय सारणी के प्रमुख कालखंड, एरा, पीरियड और एपॉक।
- मास एक्सटिंक्शन की घटनाएँ और वर्तमान एंथ्रोपोसीन।
- पृथ्वी की रासायनिक संरचना में क्रस्ट, मेंटल, कोर के तत्व और प्रतिशत।
- डिस्कंटिन्यूटी लाइनें: कोनार्ड, मोहो, रेपिटी, गुटेनबर्ग, लेहमन।
इन बिंदुओं का गहन अध्ययन और चार्ट/डायग्राम की सहायता से स्मरण परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी रहेगा।
Quiz
40 QuestionsClick on an option to find the answer
Question 1 of 40
Solution
सौर मंडल में ग्रहों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
बाहरी ग्रह आकार में छोटे हैं और उनकी सतह गैसीय होती है। आंतरिक ग्रहों में उच्च घनत्व और ठोस चट्टानी सतह होती है।उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Solution
केवल 2
पृथ्वी की उत्पत्ति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
नेबुलर परिकल्पना के अनुसार, पृथ्वी का निर्माण सूर्य के चारों ओर गैस और धूल के बादल से हुआ। पृथ्वी की स्तरित संरचना विभेदीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से उभरी। आंतरिक ग्रह चट्टानी हैं जबकि बृहस्पति ग्रह गैसीय हैं।उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
Solution
1, 2 और 3
Flashcards
10 CardsClick to reveal answerTap the card to see answer