Cell Cycle and Cell Division - UP Board Botany
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Cell Cycle and Cell Division - UP Board Botany
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PW UP Board 11th & 12th
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कोशिका चक्र, कोशिका विभाजन एवं जैव अणु
कोशिका चक्र की अवधारणा
कोशिका चक्र वह अनुक्रम है जिसमें एक कोशिका अपने विभाजन के लिए आवश्यक सभी घटनाओं को पूर्ण करती है। इसमें कोशिका की वृद्धि, डीएनए की द्विगुणन और विभाजन की प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। मानव कोशिका का चक्र लगभग 24 घंटे में पूर्ण होता है जबकि यीस्ट की कोशिका का चक्र 90 मिनट में।
- कोशिका चक्र की दो मुख्य अवस्थाएँ: इंटरफेज (अंतरावस्था) और एम फेज (माइटोटिक अवस्था)
- इंटरफेज में कोशिका विभाजन के लिए तैयार होती है, डीएनए की मात्रा बढ़ती है
- एम फेज में वास्तविक…
कोशिका चक्र, कोशिका विभाजन एवं जैव अणु
कोशिका चक्र की अवधारणा
कोशिका चक्र वह अनुक्रम है जिसमें एक कोशिका अपने विभाजन के लिए आवश्यक सभी घटनाओं को पूर्ण करती है। इसमें कोशिका की वृद्धि, डीएनए की द्विगुणन और विभाजन की प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। मानव कोशिका का चक्र लगभग 24 घंटे में पूर्ण होता है जबकि यीस्ट की कोशिका का चक्र 90 मिनट में।
- कोशिका चक्र की दो मुख्य अवस्थाएँ: इंटरफेज (अंतरावस्था) और एम फेज (माइटोटिक अवस्था)
- इंटरफेज में कोशिका विभाजन के लिए तैयार होती है, डीएनए की मात्रा बढ़ती है
- एम फेज में वास्तविक विभाजन होता है
इंटरफेज की अवस्थाएँ
इंटरफेज कोशिका चक्र की सबसे लंबी अवस्था है जिसमें कोशिका विभाजन के लिए तैयार होती है। इसमें तीन उप-अवस्थाएँ होती हैं: G1, S और G2।
- G1 फेज: कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय रहती है, वृद्धि होती है, डीएनए की प्रतिकृति नहीं होती
- S फेज (संश्लेषण अवस्था): डीएनए की मात्रा दोगुनी होती है, क्रोमोजोम की संख्या अपरिवर्तित रहती है, एनिमल सेल में सेंट्रोसोम भी डबल होता है
- G2 फेज: कोशिका वृद्धि के साथ-साथ माइटोसिस हेतु प्रोटीन का निर्माण होता है
माइटोटिक (एम) फेज और उसकी अवस्थाएँ
एम फेज में केंद्रक (कैरियोकाइनेसिस) और कोशिका द्रव्य (साइटोकाइनेसिस) का विभाजन होता है। यह चार अवस्थाओं में विभाजित है: प्रोफेज, मेटाफेज, एनाफेज, टिलोफेज।
- प्रोफेज: डीएनए संघनित होकर स्पष्ट गुणसूत्र बनाता है, केंद्रक झिल्ली व अन्य अंग धीरे-धीरे विलुप्त होते हैं
- मेटाफेज: गुणसूत्र मध्य पट्टिका पर संरेखित होते हैं, अध्ययन के लिए उपयुक्त अवस्था
- एनाफेज: संतति अर्ध गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर खिंचते हैं
- टिलोफेज: गुणसूत्र असंगनित होकर अदृश्य होते हैं, केंद्रक झिल्ली पुनः बनती है, साइटोप्लाज्म विभाजन से दो नई कोशिकाएँ बनती हैं
कोशिका द्रव्य विभाजन में अंतर
एनिमल और प्लांट सेल में साइटोकाइनेसिस की प्रक्रिया भिन्न होती है। एनिमल सेल में विभाजन बाहर से अंदर की ओर होता है जबकि प्लांट सेल में केंद्र से बाहर की ओर।
- एनिमल सेल: प्लाज्मा मेंब्रेन किनारों से अंदर की ओर धंसती है
- प्लांट सेल: मध्य से दीवार बनती है, ऊपर-नीचे दो कोशिकाएँ बनती हैं
समसूत्री एवं अर्धसूत्री विभाजन
समसूत्री विभाजन (माइटोसिस) में एक कोशिका से दो समान क्रोमोजोम संख्या वाली कोशिकाएँ बनती हैं। अर्धसूत्री विभाजन (मियोसिस) में क्रोमोजोम संख्या आधी हो जाती है, जिससे चार हैप्लॉयड कोशिकाएँ बनती हैं।
- समसूत्री विभाजन: वृद्धि, मरम्मत, रिपेयरिंग के लिए आवश्यक
- अर्धसूत्री विभाजन: युग्मकों (गेमिट्स) के निर्माण हेतु, दो चरणों में पूर्ण (मियोसिस I व II)
- मियोसिस I के प्रोफेज में पाँच अवस्थाएँ: लेप्टोटीन, जाइगोटीन, पैकाइटिन, डिप्लोटीन, डाईकाइनेसिस
- पैकाइटिन में क्रॉसिंग ओवर होता है, जिससे वेरिएशन आते हैं
जैव अणुओं के प्रकार
जैव अणु वे रासायनिक यौगिक हैं जो जीवित कोशिकाओं में पाए जाते हैं और जीवन की क्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं। मुख्य जैव अणु हैं: अमीनो अम्ल, लिपिड, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, न्यूक्लिक एसिड।
- अमीनो अम्ल: कार्बोक्सिलिक समूह, अमीनो समूह, R समूह (एल्किल) से बने होते हैं; 21 प्रकार के प्रोटीन अमीनो अम्ल
- लिपिड: पानी में अघुलनशील, फैटी एसिड व ग्लिसरॉल से बने; संतृप्त (कोई डबल बॉन्ड नहीं) व असंतृप्त (डबल बॉन्ड वाले)
- प्रोटीन: अमीनो अम्लों के पॉलीमर, पेप्टाइड बंध द्वारा जुड़े; विषम बहुलक, 20 प्रकार के अमीनो अम्ल
- कार्बोहाइड्रेट: सैकराइड इकाइयों के बहुलक; मोनोसैकराइड (एक इकाई), पॉलीसैकराइड (अनेक इकाइयाँ), जैसे सेलुलोज, स्टार्च, ग्लाइकोजन
- न्यूक्लिक एसिड: डीएनए व आरएनए; शर्करा, नाइट्रोजन क्षार, फास्फेट समूह से बने
जैव अणुओं की संरचना व बंध
अमीनो अम्लों के बीच पेप्टाइड बंध, सैकराइड के बीच ग्लाइकोसिटिक बंध, न्यूक्लिक एसिड में फास्फोडाइस्टर बंध पाए जाते हैं। प्रोटीन विषम बहुलक होते हैं, जबकि सेलुलोज व स्टार्च सम बहुलक हैं।
- पेप्टाइड बंध: अमीनो अम्लों के COOH व NH2 समूह के बीच जल वियोजन से बनता है
- ग्लाइकोसिटिक बंध: सैकराइड इकाइयों के बीच
- फास्फोडाइस्टर बंध: न्यूक्लिक एसिड में
जैव रासायनिक अभिक्रियाएँ: उपचय व अपचय
कोशिका में दो प्रकार की अभिक्रियाएँ होती हैं: उपचयी (एनाबॉलिक) व अपचयी (कैटाबॉलिक)। उपचय में साधारण पदार्थों से जटिल पदार्थ बनते हैं, अपचय में जटिल पदार्थ सरल पदार्थों में टूटते हैं।
- उपचय (एनाबॉलिक): दो या अधिक साधारण पदार्थ मिलकर जटिल पदार्थ बनाते हैं (A + B → AB)
- अपचय (कैटाबॉलिक): जटिल पदार्थ सरल पदार्थों में टूटते हैं (XYZ → X + Y + Z)
एंजाइम व सहकारक
एंजाइम जैव रासायनिक अभिक्रियाओं के उत्प्रेरक होते हैं। सहकारक (कोफैक्टर) एंजाइम को सक्रिय बनाते हैं। एंजाइम के प्रकार उनके कार्य के अनुसार नामित होते हैं।
- ऑक्सीडोडक्टेज/डिहाइड्रोजेनेस: ऑक्सीकरण व अपचयन कराते हैं
- ट्रांसफरेज: समूहों का स्थानांतरण कराते हैं
- हाइड्रोलेज़: जल अपघटन कराते हैं
- लाइगेज़: दो यौगिकों को जोड़ते हैं (जैसे डीएनए लाइगेज़)
- आइसोमरेज: समावयवता (आइसोमेरिज्म) को प्रेरित करते हैं
कोशिका विभाजन में विशेष अवस्थाएँ
कुछ कोशिकाएँ विभाजन नहीं करतीं और शांत अवस्था (G0) में रहती हैं, जैसे हृदय की कोशिकाएँ, न्यूरॉन। विभाजन के लिए तैयार कोशिकाएँ इंटरफेज से आगे बढ़ती हैं, अन्यथा G0 में चली जाती हैं।
- शांत अवस्था (G0): विभाजन न करने वाली कोशिकाएँ
- विभाजन करने वाली कोशिकाएँ: इंटरफेज से आगे बढ़ती हैं
क्रोमोजोम संख्या का संरक्षण
अर्धसूत्री विभाजन के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी क्रोमोजोम संख्या स्थिर रहती है। यदि समसूत्री विभाजन से युग्मक बनते तो क्रोमोजोम संख्या दोगुनी हो जाती।
- मनुष्य में क्रोमोजोम संख्या 46; अर्धसूत्री विभाजन से शुक्राणु व अंडाणु में 23-23 क्रोमोजोम
- निषेचन के बाद पुनः 46 क्रोमोजोम
जैव अणुओं के उदाहरण व महत्व
अमीनो अम्ल: ग्लूटामिक अम्ल (एसिडिक), लाइसीन (क्षारीय), वैलीन (उदासीन)
लिपिड: पालमेटिक अम्ल (16 कार्बन), एरेकिडोनिक अम्ल (20 कार्बन), लेसीथिन (फास्फोलिपिड)
प्रोटीन: नाखून, बाल, शरीर की वृद्धि व मरम्मत
कार्बोहाइड्रेट: ग्लूकोस (त्वरित ऊर्जा), ग्लाइकोजन (संचित ऊर्जा), सेलुलोज (पौधों में)
न्यूक्लिक एसिड: डीएनए (जेनेटिक सूचना), आरएनए (सूचना का संप्रेषण)
एंजाइम के कार्य उनके नाम से पहचाने जा सकते हैं: ऑक्सीडोडक्टेज (ऑक्सीकरण/अपचयन), ट्रांसफरेज (स्थानांतरण), हाइड्रोलेज़ (जल अपघटन), लाइगेज़ (जोड़ना), आइसोमरेज (आइसोमेरिज्म)
कोफैक्टर एंजाइम को सक्रिय करने में सहायक होते हैं, जिससे एंजाइम अपनी उत्प्रेरक क्रिया कर पाता है।
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