EVOLUTION 1 Shot Zoology NCERT - Class 12 Boards History
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EVOLUTION 1 Shot Zoology NCERT - Class 12 Boards History
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विकास (एवोल्यूशन)
विकास जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें पृथ्वी पर उपस्थित सभी जीवों के इतिहास, उनके पूर्वजों और उनके स्वरूप में समय के साथ हुए परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन बताता है कि आज के जीव हमेशा से ऐसे नहीं थे, बल्कि समय के साथ जलवायु, वातावरण और अन्य कारकों के अनुसार उनमें बदलाव हुए हैं। विकास को समझने के लिए पृथ्वी, ब्रह्मांड और जीवन की उत्पत्ति की जानकारी आवश्यक है।
ब्रह्मांड, पृथ्वी और जीवन की उत्पत्ति
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए सर्वमान्य सिद्धांत बिग बैंग थ्योरी है, जिसके अनुसार लगभग 20 बिलियन…
विकास (एवोल्यूशन)
विकास जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमें पृथ्वी पर उपस्थित सभी जीवों के इतिहास, उनके पूर्वजों और उनके स्वरूप में समय के साथ हुए परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन बताता है कि आज के जीव हमेशा से ऐसे नहीं थे, बल्कि समय के साथ जलवायु, वातावरण और अन्य कारकों के अनुसार उनमें बदलाव हुए हैं। विकास को समझने के लिए पृथ्वी, ब्रह्मांड और जीवन की उत्पत्ति की जानकारी आवश्यक है।
ब्रह्मांड, पृथ्वी और जीवन की उत्पत्ति
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए सर्वमान्य सिद्धांत बिग बैंग थ्योरी है, जिसके अनुसार लगभग 20 बिलियन वर्ष पूर्व (2000 करोड़ वर्ष) एक महाविस्फोट हुआ, जिससे ब्रह्मांड का विस्तार हुआ। पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 4.5 बिलियन वर्ष पूर्व हुई। प्रारंभिक पृथ्वी पर वायुमंडल नहीं था, ऑक्सीजन अनुपस्थित थी, और वातावरण रिड्यूसिंग था। जलवाष्प, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया आदि गैसें उपस्थित थीं। सूर्य की पराबैंगनी किरणों ने जल को H₂ और O₂ में तोड़ा, जिससे धीरे-धीरे ओजोन परत बनी और तापमान कम हुआ, जिससे महासागर बने। पृथ्वी बनने के लगभग 500 मिलियन वर्ष बाद (4 बिलियन वर्ष पूर्व) पहला जीवन अस्तित्व में आया।
जीवन की उत्पत्ति के सिद्धांत
जीवन की उत्पत्ति के बारे में कई सिद्धांत दिए गए:
- पैन्स्पर्मिया सिद्धांत: जीवन अंतरिक्ष से बीजाणुओं (स्पोर्स) के रूप में पृथ्वी पर आया।
- स्वतः जनन सिद्धांत (स्पॉनटेनियस जनरेशन): जीवन सड़ती-गली चीजों से अपने आप उत्पन्न हुआ, जिसे लुईस पाश्चर के स्वान नेक फ्लास्क प्रयोग ने खारिज कर दिया।
- रासायनिक विकास सिद्धांत (ओपेरिन-हेल्डेन): जीवन की उत्पत्ति अकार्बनिक से कार्बनिक अणुओं के बनने और उनसे जैव अणुओं के बनने से हुई। ओपेरिन ने अपनी पुस्तक "ओरिजिन ऑफ लाइफ" में यह बताया।
- मिलर का प्रयोग (1953): मिलर ने लैब में प्रारंभिक पृथ्वी जैसी परिस्थितियाँ बनाकर मीथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन और जलवाष्प को 800°C पर विद्युत स्पार्क से अभिक्रिया कराई, जिससे अमीनो एसिड, शर्करा, फैटी एसिड आदि बने।
विकास के प्रमाण
विकास के समर्थन में कई प्रमाण उपलब्ध हैं:
- जीवाश्मिक प्रमाण (फॉसिल्स): चट्टानों की तलछट में दबे जीवों के अवशेष, जिनकी आयु रेडियोएक्टिव कार्बन डेटिंग से ज्ञात की जाती है। उदाहरण: डायनासोर, आर्कियोप्टेरिक्स (बर्ड्स और रेप्टाइल्स के बीच कनेक्टिंग लिंक)।
- भ्रूणीय प्रमाण (एंब्रायोलॉजिकल एविडेंस): अर्नेस्ट हैकल के अनुसार सभी कशेरुकी जीवों के भ्रूण में प्रारंभिक अवस्था में समान लक्षण (जैसे गिल स्लिट्स) होते हैं, परंतु वयस्क अवस्था में भिन्नता आ जाती है। वॉन बेयर ने हैकल के भ्रूणीय सिद्धांत को अस्वीकार किया।
- शारीरिक एवं आकारिकी प्रमाण (एनाटॉमी और मॉर्फोलॉजी):
- समजात अंग (होमोलोगस ऑर्गन्स): संरचना समान, कार्य भिन्न (जैसे मानव, व्हेल, चमगादड़, चीता के अग्रपाद) — अपसारी विकास (डायवर्जेंट एवोल्यूशन)।
- तुल्य रूपता (एनालोगस ऑर्गन्स): कार्य समान, संरचना भिन्न (जैसे पक्षी और कीट के पंख) — अभिसारी विकास (कन्वर्जेंट एवोल्यूशन)।
- जैव रासायनिक एवं फिजियोलॉजिकल प्रमाण: सभी जीवों में प्रोटीन, डीएनए, आरएनए आदि की संरचना और कार्य समान होते हैं, जिससे समान पूर्वजता का संकेत मिलता है।
- कृत्रिम चयन (आर्टिफिशियल सिलेक्शन): मनुष्य द्वारा चयनित प्रजनन से नई नस्लें (जैसे कुत्ते की विभिन्न नस्लें) बनाना, जिससे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति भी लाखों वर्षों में ऐसा कर सकती है।
विकास के सिद्धांत
- विशिष्ट सृजन का सिद्धांत (स्पेशल क्रिएशन): धार्मिक मान्यता के अनुसार सभी जीव एक साथ और अपरिवर्तनीय रूप में बनाए गए, जो वैज्ञानिक प्रमाणों से अस्वीकार किया गया।
- डार्विनवाद (प्राकृतिक वरण/नेचुरल सिलेक्शन): चार्ल्स डार्विन के अनुसार, जीवों में विविधता होती है, जो वंशानुगत होती है। जो जीव बदलती परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलन करते हैं, वे अधिक संतति उत्पन्न करते हैं और प्रकृति उनका चयन करती है। विकास धीमी प्रक्रिया है और रिप्रोडक्टिव फिटनेस पर आधारित है।
- लेमार्कवाद: अंगों के उपयोग-अनुपयोग के अनुसार विकास (जैसे जिराफ की लंबी गर्दन)।
- म्यूटेशन थ्योरी (युगो डिब्रीज): विकास का कारण उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) है, जो अचानक और रैंडम होता है। इसे साल्टेशन भी कहते हैं।
हार्डी-विनबर्ग सिद्धांत
हार्डी-विनबर्ग सिद्धांत के अनुसार, किसी भी बड़ी, यादृच्छिक प्रजनन वाली जीव संख्या में एललील्स की आवृत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी स्थिर रहती है, जब तक कि बाहरी कारक (माइग्रेशन, जेनेटिक ड्रिफ्ट, म्यूटेशन, जेनेटिक रिकॉम्बिनेशन, प्राकृतिक वरण) न हों।
- कुल एललील आवृत्ति:
- जीनोटाइप आवृत्ति:
- : सम युग्मजी प्रभावी (होमोजाइगस डोमिनेंट)
- : सम युग्मजी अप्रभावी (होमोजाइगस रेसेसिव)
- : विषम युग्मजी (हेटेरोजाइगस)
- यदि आवृत्तियों में परिवर्तन होता है, तो विकास हुआ है।
अनुकूली विकिरण और अभिसारी विकास
अनुकूली विकिरण (एडैप्टिव रेडिएशन) वह प्रक्रिया है जिसमें एक ही पूर्वज से उत्पन्न प्रजातियाँ विभिन्न वातावरण में जाकर अनुकूलन करती हैं और नई प्रजातियाँ बनती हैं। डार्विन फिंचेस (गैलेपेगोस द्वीप) और ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल्स इसके उदाहरण हैं। जब एक ही क्षेत्र में दो अलग-अलग पूर्वजों की संताने समान कार्य करने लगती हैं, तो यह अभिसारी विकास (कन्वर्जेंट एवोल्यूशन) कहलाता है।
प्राकृतिक वरण के प्रकार
प्राकृतिक वरण तीन प्रकार का होता है:
- स्थायित्व प्राकृतिक वरण (स्टेबलाइजिंग): मीन वैल्यू का चयन (जैसे मानव शिशु का सामान्य वजन)
- दिशात्मक प्राकृतिक वरण (डायरेक्शनल): एक एक्सट्रीम का चयन (जैसे अधिक दूध देने वाली गाय)
- विदारक/डिसरप्टिव प्राकृतिक वरण: दोनों एक्सट्रीम का चयन, मीन वैल्यू कम (जैसे ग्रीन और ब्राउन बटरफ्लाई)
मानव विकास
मानव विकास की मुख्य कड़ियाँ:
- ड्रायोपेथिकस: एप जैसे, वनमानुष के पूर्वज
- रामापेथिकस: मानव के पूर्वज
- ऑस्ट्रैलोपेथिकस: 4 फीट ऊँचे, सीधे चलते थे, पूर्वी अफ्रीका में मिले
- होमोहबिलिस: 650-800 सीसी मस्तिष्क, पत्थर के औजारों का प्रयोग
- होमोइरेक्टस: 900 सीसी मस्तिष्क, मांसाहारी प्रवृत्ति
- नियंडरथल्स: 1400 सीसी मस्तिष्क, मृतकों को दफनाने की परंपरा
- क्रोमैगन: 1600 सीसी मस्तिष्क, आधुनिक मानव के निकट
- होमोसेपियंस: आधुनिक मानव, 75,000-10,000 वर्ष पूर्व अफ्रीका से अन्य महाद्वीपों में फैले, 10,000 वर्ष पूर्व कृषि की शुरुआत
विकास की प्रक्रिया और विविधता का उद्गम
विकास की प्रक्रिया में विविधता का मुख्य स्रोत वंशानुगत परिवर्तन, म्यूटेशन, जेनेटिक रिकॉम्बिनेशन, माइग्रेशन, जेनेटिक ड्रिफ्ट और प्राकृतिक वरण हैं। विविधता के कारण ही नई प्रजातियों की उत्पत्ति होती है। विकास एक निश्चयवादी (डिटरमिनिस्टिक) नहीं, बल्कि रैंडम (स्टोकास्टिक) प्रक्रिया है, जो प्राकृतिक संयोग, अवसर और म्यूटेशन पर निर्भर करती है।
- विकास धीमी या अचानक (म्यूटेशन थ्योरी) दोनों प्रकार से हो सकता है।
- अनुकूलनशीलता वंशानुगत होती है और अगली पीढ़ी में जाती है।
- प्राकृतिक वरण, म्यूटेशन, जेनेटिक ड्रिफ्ट, माइग्रेशन, जेनेटिक रिकॉम्बिनेशन — ये पाँच कारक विकास को प्रभावित करते हैं।
Additional Notes
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Question 1 of 120
Evolutionary biology is the study of
Solution
History of life forms on earth
“Evolution is a stochastic process based on chance events in nature and chance mutation in the organisms”. This statement tells us about;
Solution
non directional nature of evolution.
Oparins theory of "Origin of life" is based on:
Solution
chemical evolution
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